वेद स्वाध्याय में आचार्यश्री डॉ. संजय देव  के विचार

इन्दौर 7 जून 2009, भारतीय संस्कृति के प्रखर चिन्तक वेदमर्मज्ञ आचार्यश्री डॉ. संजयदेव ने कहा है कि "शास्त्रीय विधिपूर्वक यज्ञ करने से निश्चित रूप से बरसात होती है और महामारियॉं नहीं फैल पातीं। वर्तमान में अनेक स्थानों पर बरसात की कामना से यज्ञ किये जाने पर भी बरसात नहीं होती। इसका कारण यह है कि इन यज्ञों में ऐसे पदार्थों की आहुतियां दी जा रही हैं जिनसे बरसात नहीं होती।" आचार्यश्री ने दिव्य मानव मिशन द्वारा बैक कालोनी में आयोजित वेद स्वाध्याय के अवसर पर यह विचार प्रकट किये। आचार्यश्री ने कहा कि "वैदिक ग्रन्थों में बरसात के लिये किये जाने वाले यज्ञ हेतु विशिष्ट औषधियों से युक्त हवन सामग्री की आहुति दिये जाने का विधान किया गया है। अतः आवश्यकता इस बात की हैकि बरसात के लिये किये जाने वाले यज्ञ इस विषय के विशेषज्ञ विद्वान के निर्देशन में होने चाहिए। ऐसा होने पर निश्चित रूप से बरसात होगी तथा जल की समस्या का समाधान हो जाएगा।  यज्ञ करने से रोगों के कीटाणुओं का नाश होता है। आजकल जब से यज्ञ-हवन का प्रचलन कम हुआ है तभी से जहॉं-तहॉं उपद्रव होने लगे हैंतथा पर्यावरण दूषित हो रहा है। पर्याप्त वर्षा नहीं हो पा रही है। अनेक प्रकार के रोग बढ़ते जा रहे हैं। ऐेसी विकट स्थितियों का समाधान यज्ञ से ही पूर्णतया संभव है। यज्ञ वैदिक ऋषियों का विज्ञान है। यह कोई टोना-टोटका नहीं है।"

आचार्यश्री ने यज्ञ-हवन की महत्ता पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि ""यज्ञ से पर्यावरण की शुद्धि होती है। अग्नि की यह विशेषता है कि वह किसी भी पदार्थ की शक्ति को हजारों गुना बढ़ा देती है। यज्ञ की अग्नि में डाले गए घी व सुगंधित-पौष्टिक पदार्थ पर्यावरण को शुद्ध करते हैं। यज्ञ से शारीरिक, मानसिक व सामाजिक पर्यावरण की रक्षा होती है। यदि गलत पदार्थों को अग्नि में डाला जाएगा तो उनकी शक्ति भी अनंत गुना बढ़ जाएगी, जिससे पर्यावरण अत्यधिक प्रदूषित होगा। उदाहरण के लिए यदि आप लालमिर्च खाएंगे तो उसका प्रभाव केवल आप पर ही होगा,लेकिन उसी मिर्च को अग्नि में डाल देंगे तो आसपास व दूर बैठे लोग भी परेशान हो उठेंगे। ठीक इसी प्रकार यदि आप स्वादिष्ट-पौष्टिक-सुगंधित व रोगनाशक पदार्थों को खाएंगे तो उसका प्रभाव केवल आप पर ही होगा, लेकिन यदि इन्हीं पदार्थों को अग्नि में डालेंगे तो दूर-दूर तक इनकी शक्ति फैलकर पर्यावरण के विष को समाप्त करते हुए सुगंध फैलाएगी।" आचार्यश्री ने आगे कहा कि "यज्ञ से हमें अपार शांति का एहसास होता है और सारे तनाव दूर हो जाते हैं। प्राचीन भारत में हर व्यक्ति और हर परिवार के लिए यज्ञ-हवन करना अनिवार्य हुआ करता था। यज्ञ किए बिना कोई भोजन तक ग्रहण नहीं करता था। यही कारण था कि उन दिनों समय पर बरसात हुआ करती थी। समूचा देश धनधान्य से परिपूर्ण था और सोने की चिड़िया कहलाता था। यह यज्ञ का ही अद्‌भुत प्रभाव था कि रामायण काल (त्रेता युग) में कोई भी रोगी नहीं था, कोई असमय बूढ़ा नहीं होता था और पिता के सामने बेटे की मृत्यु नहीं होती थी। उस समय न अकाल पड़ता था और न ही महामारियॉं फैलती थीं। प्रजा बेहद सुखी थी।" आचार्यश्री ने कहा कि बरसात के लिए यज्ञ हेतु उनसे मोबाईल नं. 9302101186 पर सम्पर्क किया जा सकता है।

इस अवसर पर श्री सतपाल शास्त्री के सुमधुर भजन भी हुए। डालचन्द डाडिया ने आचार्यश्री  का स्वागत किया तथा आभार प्रकट किया।

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