प्रातःकाल उठते ही प्रतिदिन बिना दन्त मंजन किये केवल कुल्ला करके सवा लीटर (लगभग चार गिलास) पानी एक साथ पीना चाहिए। जल पीने के बाद मंजन आदि कर सकते हैं। इतना पानी एक साथ नहीं पिया जा सके तो पहले पेटभर पीकर 4-5 मिनट बाद वहीं पर चलकर शेष पानी पी लें। बीमार व्यक्ति यदि एक साथ चार गिलास न पी सकें तो पहले एक या दो गिलास से प्रयोग प्रारम्भ करें, धीरे-धीरे बढ़ाकर चार गिलास तक आ जाएं। इसके बाद पूरा पानी जारी रखें। एक साथ इतना पीने से शरीर पर कोई कुप्रभाव नहीं पड़ता है। थोड़ी देर में दो-तीन बार पेशाब अवश्य आयेगा, परन्तु चार-पॉंच दिन बाद वह नियमित हो जायेगा।

भोजन करते समय या भोजन के बाद कब- कैसे और कितना पानी पीना चाहिये, उसका नियम यह है कि भोजन के दो घण्टे बाद पानी पीना चाहिए, बीच में उसके पहले न पीयें। भोजन के समय पानी की ज्यादा आवश्यकता पड़े तो 10 मि.ली. तक ही पीना चाहिये। भोजन के बाद दो घूंट पानी अन्न-नलिका साफ करने से उद्देश्य से पीयें। भोजन के बाद दो घण्टे न रुक सकते हों, तो एक घण्टे बाद 200 मि.ली. पानी पिया जा सकता है और दो घण्टे बाद आप कितना भी पी सकते हैं।

खाये हुए पदार्थ को पेष्ट बनने में लगभग दो घण्टे का समय लगता है। भोजन के समय गैस्ट्राईट नामक गैस भोजन पचाने हेतु पैदा होती है, वही गैस भोजन का पेष्ट में रूपान्तर करती है। वह जल में घुलनशील है। भोजन के तुरन्त बाद पानी पीने से गैस जल में घुलने से अन्न का पाचन होने में कठिनाई होती है। ऐसी हालत में कच्चा अन्न आंतों में जाकर सड़न पैदा करता है,जिससे अम्ल पित्त होता है। अम्लपित्त एसीडिटी ही रोगों की जड़ है। इसलिये भोजन के तुरन्त बाद पानी नहीं पीना चाहिये।

रात्रि के भोजन के बाद बिस्तर पर जाते समय पानी के अलावा कुछ भी सेवन न करें। सोने से कम से कम एक घण्टा पहले खाना-पीना हो जाना चाहिए। दोनों समय भोजन के एक घण्टा पहले भरपूर पानी पीने से अग्नि प्रदीप्त होकर भूख बढ़िया लगती है। जल अशुद्ध हो तो उबले (गर्म जल) का ही प्रयोग करें। दिन भर में कम से कम छः लीटर पानी पीना ही है, ज्यादा भी पी सकते हैं। शुरू-शुरू में चार-पॉंच दिन कठिनाई रहेगी, बाद में स्थिति सामान्य हो जायेगी ।

आयुर्वेद में और प्राकृतिक चिकित्सा में इसे जलोपचार या जल चिकित्सा कहा गया है। पानी के इस सफल प्रयोग से कई बीमारियॉं ठीक होती हैं जैसे- सिरदर्द, रक्तचाप (ब्लडप्रेशर), पाण्डु (जॉण्डिस, पीलिया), आमवात, चर्बी बढ़ना, संधिवात, नाक की हड्डी बढ़ने से जुकाम रहना, नाड़ी की धड़कन बढ़ना, दमा, खॉंसी, पुरानी खॉंसी, यकृत (लीवर) के रोग, गैस, अम्ल पित्त (एसीडिटी), अल्सर, मलावरोध, अन्न नलिका में अंदर से सूजन, गुदा बाहर आना, अर्शरोग (बवासीर, पाइल्स), मधुमेह (डायबिटीज), आमातिसार, क्षयरोग (टी.बी.), पेशाब की बीमारियॉं, आँखों की बीमारी, गले के विकार तथा महिलाओं के अनियमित मासिक धर्म (माहवारी), श्वेत प्रदर (ल्यूकोरिया), गर्भाशय का कर्कट रोग (कैंसर) इत्यादि।-डॉ. मनोहरदास अग्रावत, दिव्य युग अप्रैल 2009, Divya yug April 2009

 

 

 

 

 

 

 

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