आज बाजार में दुकानें खाद्य पदार्थों के पैकेट, डिब्बों व पाउचों से लदी पड़ी हैं। इसके साथ ही मनभावन अखाद्य पदार्थों जैसे गोली, टॉफी, चाकलेट व नाना प्रकार के पदार्थों की भरमार है। केवल बच्चों की ही नहीं बड़े व्यक्ति की नजर भी उन पर पड़ जाए तो मुंह में पानी भर आता है और स्वाद के लालचवश उसे अनावश्यक ही खरीद लेता है। छोटे बच्चे तो ऐसी दुकान पर इतनी जिद्द कर लेते हैं कि अभिभावकों को उन्हें शांत करने के लिए ऐसे पदार्थ दिलाने ही पड़ते हैं। यह हाल केवल दुकानों का नहीं है। हर गली के मोड़ पर लगे केबिन, डेरी बूथ व ठेले पर रंग बिरंगे मनमोहक रंगों की बंधन मालाएँ लटक रही है जिनमें चबीणे, गुटके व पान मसाले उपलब्ध हैं। ये सारे पदार्थ मनुष्य के स्वास्थ्य के भक्षक बन रहे हैं। क्योंकि इनमें खुसबू, स्वाद व परिरक्षण (प्रिजर्वेशन) के लिए अनेक प्रकार के कृत्रिम रंग-रसायन मिलाए जाते हैं।

स्वास्थ्य के साथ ये सारे पदार्थ मनुष्य को आर्थिक कमजोरी की ओर धकेल रहे हैं। क्योंकि तथाकथित सरकारी नियंत्रण की धज्जियॉं उड़ाते हुए सभी निर्माताओं ने अपनी मनमर्जी से इन पर एम.आर.पी. (अधिकतम बिक्री मूल्य) लिख दिए हैं। इस एम.आर.पी. का कितना औचित्य है, किसी को पता नहीं। कुछ विक्रेता तो एम.आर.पी. से आधे या उससे भी कम मूल्य पर वस्तु बेचते हैं, तो कुछ उसी वस्तु को टैक्स या अन्य सुविधा उपलब्ध कराने के नाम पर एम.आर.पी. से अधिक मूल्य पर भी बेचते हैं। रेलवे स्टेशनों, रेलों व दुर्गम इलाकों में तो यह लूट आम बात हो चुकी है व अनियंत्रित है।

इस प्रकार यह निसंकोच कहा जा सकता है कि देश की भोली-भाली जनता को स्वास्थ्य व पैसे की दृष्टि से लूटने का एक सुनियोजित षड्‌यंत्र सा रचा जा चुका है।

इन खाद्य पदार्थों में गुणवत्ता व पौष्टिक तत्वों की क्या हालत है, किसी को कोई सही जानकारी नहीं है। निर्माता द्वारा उन पर शब्दों का जाल रचाकर ऐसे लिखा जाता है कि उपभोक्ता को वस्तुस्थिति समझ ही नहीं आती तथा वे भ्रमित हो जाते हैं। बुराई छिपा दी जाती हैं और अच्छाई जो बुराई में परिणित हो चुकी है, को भी अच्छाई ही बताया जाता है। उदाहरण के तौर पर अमुक खाद्य पदार्थ के एक घटक में अमुक पौष्टिकता है, तो उस पर अंकित किया जाता है, पर उसे तलने-भुनने-परिष्कृत करने या रसायन मिलाने से क्या हानियॉं आ गई हैं, यह नहीं दर्शाया जाता है। बिस्किट के मैदे में तथा नमकीन के बेसन में कितना प्रोटीन/कैलोरी है, यह तो दर्शाया जाता है, पर इसमें स्वाद तथा आकर्षक बनाने व परिरक्षण (प्रिजर्वेशन) के लिए क्या रसायन मिलाए गये हैं, परिष्कृत (रिफाइन) करने में क्या तत्व हटा दिए गए तथा तलने या भुनने में क्या विकृति उस पदार्थ में आ गई, इसका कोई उल्लेख नहीं किया जाता है।

आज विज्ञापन माल बेचने का बड़ा जरिया बन चुका है। बड़ी से बड़ी कम्पनी भी माल बेचने हेतु भ्रमित स्कीमों की घोषणाएँ करती है तथा तरह तरह के लालच देती है। उपभोक्ता को ध्यान ही नहीं आता कि विज्ञापन का जो पैसा खर्च होता है या आकर्षक पैकिंग का खर्च, जो कई बार वस्तु के मूल्य से अधिक होता है, वह भी उसी उपभोक्ता से अप्रत्यक्ष रूप से वसूला जाता है। उपभोक्ता श्रमविहीन जीवन जीने तथा सुविधाभोगी प्रकृति के कारण उनके जाल में फंसता रहता है। ऐसे जंक खाद्य पदार्थों से उपभोक्ता के पैसे का तो दुरुपयोग होता ही है, साथ ही वह पौष्टिक तत्वों से वंचित भी रहता है तथा रंग-रसायनों के कुप्रभाव के कारण रोगों का शिकार होता है।

आज दुनिया के चिकित्सा विशेषज्ञ इस बात पर एक मत हैं कि जंक फास्ट फूड से बच्चों और बड़ों में कई प्रकार के रोग बढ़ रहे हैं। मोटापा, रक्तचाप, मधुमेह, कब्ज, हृदयरोग इत्यादि के लिए ऐसे खाद्य पदार्थ एक बड़ा कारण है। ऐसे खाद्य पदार्थों के हानिकारक होने के दो मुख्य कारण है। एक तो उनमें परिरक्षण (प्रिजर्वेशन) के लिए तथा स्वादिष्ट व खुशबुदार बनाने के लिए कई तरह के कृत्रिम रंग-रसायन मिलाए जाते हैं। ये धीरे-धीरे शरीर के अवयवों को हानि पहुंचाते हैं व मनुष्य को रोगग्रस्त कर देते हैं। इनमें कई पदार्थ तो कैंसरजनक होते हैं। दूसरा ऐसे खाद्य पदार्थों को स्वादिष्ट व मनमोहक बनाने के लिए परिष्कृत (रिफाइन) किया जाता है, जिससे उनके कई पौष्टिक तत्वों का नाश हो जाता है या कमी आ जाती है।

प्रो. रघुनाथ सिंह

दिव्य युग जुलाई 2009 इन्दौर Divya yug july 2009 Indore

 

 

 

 

 

 

 

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