अंग्रेजों के आने तक भारत में सब कुछ ठीक चल रहा था। मुसलमान हिन्दुओं को जबरन मुसलमान बनाते थे। न बनने पर उनकी हत्या करते, उनके मन्दिर तोड़ते थे। किन्तु कभी मुसलमानों ने हिन्दुओं के महापुरुषों को कल्पित नहीं कहा, कभी उनकी सभ्यता-संस्कृति की प्राचीनता को नहीं नकारा, कभी उन्हें कहीं बाहर से आया नहीं कहा। वे भारत के शासक जरूर बने, किन्तु हिन्दुओं की सभ्यता-संस्कृति की विशेषता पर कभी अंगुली नहीं उठाई।

अंगरेज आये, शासक बने, किन्तु हिन्दुओं की सभ्यता-संस्कृति और दर्शन के ज्ञान को देख स्वयं को बौना पाया। लंबे समय तक यहॉं राज करने के लिये स्वयं को हिन्दुओं से श्रेष्ठ सिद्ध करना आवश्यक था, जो हो नहीं सकता था। तब उन्होंने यह प्रचार किया कि हम दोनों ही आर्य हैं और कभी एक ही जगह रहते थे। एक कबीला पॉंच हजार वर्ष पूर्व भारत चला आया। उनके वेद भी तभी लिखे गये हैं। कृष्ण और राम को अति प्राचीन बताये जाने वाली कथाएं कपोल-कल्पित हैं। ना तो कृष्ण हुए ना राम और उनके समय के बताये जाने वाले अस्त्र-शस्त्र, श्रेष्ठ सभ्यता-समृद्धि कोरी कल्पना है।

उन्होंने भारतीयों के बाहर से आने तथा उनके धर्मग्रन्थों को काल्पनिक सिद्ध करने के लिये पाठ्‌यक्रम  ऐसा पढ़ाना शुरु किया और मानसिक दासों की एक पीढ़ी भारत में तैयार हो गई। ये लोग हर उस प्रमाण को नष्ट करने पर तुले हैं, जिससे भारतीयों की श्रेष्ठता व प्राचीनता सिद्ध होती है। इसी क्रम में राम सेतु की वास्तविकता को नकारा जा रहा है। हमारी आस्था का मजाक उड़ाया जा रहा है।

पश्चिम के लोग भारतीयों की सभ्यता को मात्र पॉंच हजार वर्ष पुराना मानते थे। वे आर्यों के पुरातन काल से भारत में बसे होने के भौतिक प्रमाण मांगते थे। ऐसे में सरस्वती नदी की खोज हुई और उसके ग्लेशियर ने बीस हजार वर्ष से भी अधिक समय से जल देना बन्द कर दिया है, वैज्ञानिकों के इस कथन ने भारतीय सभ्यता को बीस हजार वर्ष पुरानी सिद्ध कर दिया। बस इसके भौतिक प्रमाण हमारे पास नहीं थे।

अभी कुछ वर्ष पूर्व अमरीकी अन्तरिक्ष संस्था नासा ने चित्र सहित एक समाचार प्रकाशित किया कि भारत और श्रीलंका के मध्य अंतरिक्ष से एक पुल दिखाई दे रहा है। नासा ने कहा कि यह पुल प्राकृतिक नहीं मानव निर्मित है और पुल 17 लाख वर्ष पुराना है। याने 17 लाख वर्ष पूर्व पुल नहीं था। बाद में बना है, फिर पुल के प्राकृतिक होने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता।

पश्चिमी मान्यताएँ ध्वस्त- नासा की इस खोज से पश्चिम की विश्व सभ्यता सम्बन्धी सभी मान्यताएं ध्वस्त हो गई। वामपंथियों और पश्चिम की धारणाओं की धज्जियां उड़ गई। पश्चिमी विद्वान वर्तमान मानव सभ्यता को दस हजार वर्ष से अधिक प्राचीन नहीं मानते थे। वे मिश्र, बेबिलोन (ईराक), रोमन, ग्रीक सभ्यताओं को विश्व की प्राचीनतम सभ्यता कहते हैं। इन पश्चिमी विद्वानों का कहना है कि इन्हीं प्राचीन सभ्य देशों से सभ्यता सारे संसार में फैली। इसके पहले सारे संसार के लोग असभ्य थे, नंगे रहते थे, शिकार कर खाते थे, वृक्षों में उगने वाले फल खाते थे। उनकी परस्पर संवाद के लिये कोई भाषा नहीं थी, फिर लिपि के होने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। मानव परस्पर इशारों में व टूटे-फूटे उच्चारण द्वारा बात करता था। ये प्राचीन मानव पत्थरों के औजारों का शिकार करने, मांस काटने, वृक्षों के फल तोड़ने में उपयोग करते थे । प्राचीन मानव आग जलाना भी नहीं जानते थे। इन विद्वानों का कहना है कि मानव सभ्यता का विकास यूरोप व पश्चिम एशिया में हुआ। यहीं से आर्य जाति पांच हजार वर्ष पूर्व भारत गई। इसके पूर्व भारत में असभ्य जंगली लोग रहते थे। भारत में आर्यों के आने के पूर्व एक अल्प सभ्य द्रविड़ जाति रहती थी। आर्यों ने आक्रमण कर इन्हें जंगलों व दक्षिण में खदेड़ दिया।

नासा द्वारा भारत-श्रीलंका के मध्य पुल की खोज से यह प्रश्न उठा कि दक्षिण भारत में वह कौन सी सभ्य जाति रहती थी, जिसके इंजीनियरों ने तीस किलोमीटर लंबा पुल बांधा। उन्हें पुल बनाने की आवश्यकता क्यों पड़ी? लंका जाने के लिये तो नावों का उपयोग भी किया जा सकता था।

भारतीय विद्वानों ने तुरंत उत्तर दिया कि अयोध्या के राम की पत्नी सीता का हरण, लंका के राजा रावण ने महाराष्ट्र की गोदावरी नदी के तट पर स्थित नासिक नामक स्थान से किया था। उसके पूर्व यह स्थान पांच वट वृक्षों के कारण पंचवटी कहलाता था। लक्ष्मण द्वारा रावण की बहन शूर्पणखा की नासिका (नाक) काटने के कारण नासिक कहलाने लगा।

शूर्पणखा की नाक काटने का बदला लेने के लिये रावण ने राम की पत्नी सीता का हरण किया और लंका ले गया। अपनी पत्नी को छुड़ाने के लिये राम ने वानर (कमाण्डो) सेना के साथ लंका पर आक्रमण किया। रावण के पास लाखों की राक्षस सेना और शक्तिशाली नावों का बेड़ा था। इस कारण जल मार्ग से वानर सेना का लंका पहुंचना असंभव था। बड़ी नावों को बनाने में भी कई महीने लग सकते थे। शस्त्रों सहित तीन लाख लोगों को लंका तट पर उतारने के लिये 100 वानर प्रति नाव के मान से सैकड़ों नावों की आवश्यकता थी। फिर रावण की प्रशिक्षित जल सेना के बड़े जहाजों से मुठभेड़ की भी संभावना थी। इस कारण वानर सेना के इंजीनियर नल ने उस उथले सागर को सेतु बांधने के लिये चुना, जो भारत श्रीलंका के मध्य था और उस काल में भी रावण के बड़े जहाज उस उथले सागर को पार नहीं कर पाते थे, जहाजों के पेंदे सागर की रेत में फंस जाते थे। यह उथला सागर तीन-चार किलोमीटर चौड़ा और तीस किलोमीटर लंबा होकर लंका के तट से लेकर भारतीय तट तक था। पुल बांधते समय रावण के बड़े जहाज निकट नहीं आ सकते थे और जहाजों से राक्षस सेना के छोड़े गए बाण भी पुल बांधते समय वानर सैनिकों तक नहीं पहुंचते थे।

रामसेतु वानर इंजीनियरों का कमाल- वाल्मीकि ने बड़ी सूक्षमता से पुल निर्माण का वर्णन किया है। साधारणतया लोग यह समझते हैं कि रामसेतु रामेश्वर या धनुष्कोटि से दक्षिण दिशा की ओर बनाया गया होगा। किन्तु रामसेतु का निर्माण भारत भूमि से पूर्व दिशा की ओर हुआ है। लंका का उत्तरी एक तिहाई भाग भारत के पूर्व में पड़ता है, दक्षिण में नहीं। लंका का तलाई मन्नार द्वीप भारत के ठीक पूर्व में स्थित है, जहॉं तक रामसेतु बनाया गया था। वाल्मीकि ने लिखा है कि श्रीराम, सागर तट पर कुशा आसन बिछाकर पूर्व की ओर मुंह कर लेट गये। (वाल्मीकि रामायण युद्धकाण्ड 21वां सर्ग प्रथम श्लोक) यदि पुल बनाने योग्य स्थान दक्षिण की ओर होता, तो पुल बनता देखने के लिये राम दक्षिण की ओर मुंह करके लेटते।

भारत की मुख्य भूमि जहॉं वानर सेना का पड़ाव था, वह स्थान रामनाड या रामनाथपुरम्‌ कहलाया। इस स्थान के मध्य से वेगई नदी बहती है। नदी के दोनों ओर वानर सेना का पड़ाव था। नदी के दोनों ओर फैले नारियल, ताड़, केले व अन्य फलों के वृक्ष जो आज भी स्थित हैं वानर सेना की भोजन आपूर्ति करते थे व नदी का मीठा जल पीने के काम आता था।

विश्वकर्मा के पुत्र नल ने सेतु बांधने का कार्य प्रारम्भ किया। इन विश्वकर्मा ने ही कभी लंका द्वीप में भवन बनाये थे। (वा.रा. उत्तराकांड पांचवां सर्ग श्लोक 22 से 29) वानर निकट के वन में वन पर्वतों में घुस गये और हाथियों के आकार की बड़ी-बड़ी चट्‌टानें व वृक्ष यंत्रोें पर ढोकर लाने लगे। शिलाओं व वृक्षों से उथला सागर पाटा जाने लगा। वानर लंबा सूत हाथ में पकड़े पुल को सीधा बांध रहे थे। कुछ वानर दण्ड (बांस) हाथ में लिये सागर की गहराई नाप रहे थे। कहीं गहरे सागर में लकड़ियॉं तैराकर उन्हें परस्पर तिनकों व नारियल की रस्सियों से बांधा जा रहा था। वेगई नदी के समतल ढलवां किनारे से चट्‌टानें व वृक्ष यंत्रों से ढोकर लाये जा रहे थे।  (वाल्मीकि रामायण युद्ध काण्ड 22वां सर्ग श्लोक 54 से 72 तक) इस प्रकार के बड़े ट्राले व रथ आज भी तमिलनाडु के प्रत्येक बड़े गांव में स्थित मंदिरों में रखे देखे जा सकते हैं, जो दस-बीस फुट तक ऊंचे विशालाकार होते हैं।

कुल पांच दिनों में पुल बनकर तैयार हुआ। बीच-बीच में आये छोटे द्वीपों पर बुल बॉंधना नहीं पड़ा और वानर सेना लंका की मुख्य भूमि पर मन्नाई से बावुनिया शहर तक पूर्व में परांगी नदी से पश्चिम में आरुवी नदी के मध्य 25 किलोमीटर चौड़े और 60 किलोमीटर लंबे भू भाग पर छावनी डालकर बैठ गई। इस क्षेत्र में भी नदियों का मीठा पानी व क्षेत्र के फलदार वृक्ष वानर सेना की खाद्य आपूर्ति

करते थे।

भारत की प्राचीन सभ्यता का डंका बज गया- नासा की खोज ने यह सिद्ध कर दिया कि भारत में 17 लाख वर्ष पूर्व भी एक सभ्य जाति रहती थी, जिसके पास अच्छे इंजीनियर थे। फिर पश्चिम की यह कल्पना झूठी सिद्ध हो गई कि आर्य पांच हजार वर्ष पूर्व पश्चिम से भारत आये। पुल का 17 लाख वर्ष पुराना, मानव निर्मित होना भी त्रेता में पैदा हुए राम के काल को सिद्ध करता है।

1. अभी कलियुग के बीते हैं - 5,000 वर्ष

2. द्वापर बीत गया - 8,64,000 वर्ष

3. त्रेता बीत गया - 12,96,000 वर्ष

कुल - 21,64,000 वर्ष

पुल की आयु बताई गई है 17,00,000 वर्ष। त्रेता के चार लाख पैंसठ हजार वर्ष बीतने के बाद ही राम का प्रादुर्भाव हुआ था । ग्रन्थों में लिखा है कि राम त्रेता में हुए थे। भारतीय कालगणना में राम की उपस्थिति त्रेता युग में बताई गई है, जो नासा द्वारा कहे गये सेतु के निर्माण से मेल खाती है। एक वामपंथी विद्वान ने मुझसे प्रश्न किया कि हम कैसे मानें कि उस काल में ऐसे कुशल शिल्पज्ञ थे, जिन्होंने सेतु का निर्माण किया? क्या उस काल का कोई दूसरा उदाहरण भी इन शिल्पज्ञों का है? मैंने उन्हें पुराणों (इतिहास) की एक कथा सुनाई। अयोध्या के पूर्व में गोमती नदी है और दक्षिण में 250 किलोमीटर दूर चम्बल नदी बहती है। पश्चिम में 700 किलोमीटर पर सरस्वती नदी थी। आज उत्तरप्रदेश के पश्चिम में बहती यमुना उस काल में सरस्वती की सहायक बन पश्चिम में चली जाती थी। अवर्षा में यहॉं घोर अकाल पड़ता था। अयोध्या के राजा सगर ने अपने शिल्पज्ञों से उत्तर के ग्लेशियर का जल हिमालय की चट्टानों को तोड़ मैदान में लाने को कहा। सगर की चार पीढियॉं सगर, असमंज, अंशुमान, दिलीप खप गई। सफलता मिली पॉंचवी पीढ़ी के राजा भागीरथ को। वे गंगा को स्वर्ग (तिब्बत, कश्मीर, हिमाचल, उत्तराखंड) से मैदान में लाये। ये राजा सगर, राम की पच्चीस पीढी पूर्व हुए थे। कुशल शिल्पज्ञ, राम की पच्चीस पीढ़ी पूर्व भी होते थे। गंगा प्राकृतिक नदी नहीं है, मनुष्य द्वारा बहाई गई है। इसी कारण गंगा का उद्‌गम लगातार पीछे हटता जा रहा है। सगर के काल में जो उद्‌गम गंगोत्री में था, वह आज 35 किलोमीटर उत्तर में खिसक गया है। (वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड 38 से 44वां सर्ग तक)l क्रमशः

 लेखक- रामसिंह शेखावत, दिव्ययुग दिसम्बर 2008 (Divya Yug 2008)

 

 

 

                             पावन विचार

मनुष्य को चाहिए कि दूसरों के दोष उसके सामने कहेलेकिन उसको बदनाम करने के लिये तथा उसका मन दुखाने के लिए नहीं कहे। किन्तु प्रेम से समझाकर कहेजिससे वह मनुष्य अपने दोषों को दूर कर सके। और उसके पीठ पीछे उसके गुणों को कहेजिससे दोषी मनुष्य दूसरों से अपने गुणों को सुनकर प्रेरणा लेकर अपने दोषों को दूर कर सके। महर्षि दयानन्द सरस्वती

 

 

 

 

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