आज संसार में चारों ओर अशान्ति, अनाचार, अत्याचार, व्यभिचार व भ्रष्टाचार का ताण्डव नृत्य हो रहा है। भाई-भाई, पिता-पुत्र, पति-पत्नी सभी में द्वन्द्व युद्ध चल रहा है। दो परिवार, दो मुहल्ले, दो गॉंव, दो प्रदेश, दो देश आपस में संघर्षरत हैं। वर्गवाद, भाषावाद, जातिवाद, सम्प्रदायवाद ने सर्वत्र गृहयुद्ध की स्थिति उत्पन्न कर दी है। मानव अपने ही द्वारा प्रज्ज्वलित अग्नि में स्वयं

दग्धित है।

आदिकाल से ही मनुष्य शान्ति का अन्वेषक रहा है। शान्ति स्थापनार्थ समयानुसार विभिन्न राज्य व्यवस्थाओं की रचनाएं हुई हैं। पूंजीवाद, साम्यवाद, व समाजवाद आदि समस्त वाद इसी का परिणाम हैं । पर क्या इन वादों में से किसी ने भी मनुष्य को शान्ति व आनन्द की अनुभूति भी होने दी है? निष्पक्ष इतिहासविदों का मत है कि आज तक इन शासन व्यवस्थाओं में से किसी ने भी ने मनुष्य को पूर्णरूपेण भय व आतंकविहीन नहीं किया है।

राजनीतिक दलों ने मनुष्यों को आपस में लड़ाया ही है। अपने राजनीतिक स्वार्थ की सिद्धि के लिए वर्गवाद, भाषावाद, जातिवाद व सम्प्रदायवाद की अत्यधिक वृद्धि ही की है। स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात तीस वर्ष तक निर्वाध रूप में एक ही दल का देश में शासन रहा तथा अब भी उसी का शासन है। पर क्या वह दल किंचित सुख व शान्ति की स्थापना देश में कर सका?

आपात्काल की प्रतिक्रियास्वरूप विभिन्न विचारधाराओं वाले अनेक राजनीतिक दलों का एक दल निर्मित होकर जनता पार्टी के रूप में शासनारूढ़ हुआ। बहुत अपेक्षाएं की गई थी इस दल से, पर परिणाम प्रत्यक्ष है, प्रमाण की आवश्यकता ही क्या है ?

आज बन्द, हड़तालें, प्रदर्शन, धरने, गोलीकाण्ड, आगजनी व लूटपाट, सामूहिक हत्याएं व सामूहिक बलात्कार, डाकाजनी व राहजनी, अपहरण व साम्प्रदायिक दंगे तथा बम विस्फोट कहॉं नहीं हो रहे हैं ? मानवता पर दानवता की विजय!

विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या सुख व शान्ति का कोई मार्ग मानव जाति के लिए है या नहीं? क्या मनुष्य मृग मरीचिकावत्‌ इसी प्रकार भटकता रहेगा ? नहीं, निराश होने की कोई बात नहीं है। दयालु परमपिता परमात्मा ने सृष्टि के आदिकाल में ही वेदों के माध्यम से एक संविधान की रचना मानव मात्र के लिए की और उसकी यह रचना अनादिकाल से अनन्तकाल तक प्रवाह रूप में होती रहती है। इस ईश्वर कृत संविधान के अनुरूप आचरण कर मनुष्य आनन्द ही नहीं, वरन्‌ उस परमानन्द को भी प्राप्त कर सकता है, जो वर्णनातीत है।

वेद में स्पष्ट घोषणा की गई है कि "मनुर्भव' अर्थात्‌ मनुष्य बन। नहीं कहा कि तू हिन्दु बन, मुसलमान बन, ईसाई बन, कांग्रेसी बन, भाजपाई बन, कम्युनिष्ट बन, रूसी बन या जापानीबन। तू कुछ भी बन, पर मनुष्य अवश्य बन। सब कुछ बन जाने पर यदि मनुष्य नहीं बना तो कुछ भी नहीं बना।

कहते हैं कि यूनान के सन्त सुकरात का एक शिष्य दिन के प्रकाश में हाथ में मशाल लिये बीच बाजार में खड़ा हुआ था। आगन्तुक उसे मूर्ख समझकर उपेक्षित दृष्टि से देेखते और मुस्कुराते हुए चले जाते थे। अन्त में किसी जिज्ञासु ने आकर पूछा- ""महात्मन्‌, आप दिन के प्रकाश में यह मशाल लेकर क्या खोज रहे हैं?'' महात्मा ने सहज स्वभाव से उत्तर दिया- ""भद्र, मैं मनुष्य ढूंढ रहा हूँ।'' कितनी व्यंग्य व्यथा थी उसके हृदय में। आप कहीं भी किसी भी व्यक्ति से परिचय प्राप्त कीजिएगा, पूछिए कौन है? उत्तर मिलेगा, मैं इंजीनियर हूँ, मैं डॉक्टर हूँ, मैं प्रोफेसर हूँ, मैं वकील हूँ, मैं व्यापारी हूँ, मैं विद्यार्थी आदि-आदि। कहीं कोई यह नहीं कहते सुना कि मैं मनुष्य हूँ।

सब कुछ बनते हुए मनुष्य यदि मनुष्य बन जाता तो क्या कोई इंजीनियर ठेकेदार से सांठगांठ कर कच्चे पुलों का निर्माण कर देता? डॉक्टर क्या रोगी को औषधि के स्थान पर पानी का इंजेक्शन लगाकर लोगों की जान से खिलवाड़ करता? व्यापारी क्या आटे में सेलखरी मिट्टी मिलाता? पुलिस का दरोगा जो कानून व शान्ति व्यवस्था का रक्षक होता है, डाकुओं से मिलकर डाका डालने जाता या बलात्कार के आरोप में दंडित होता ? रक्षक ही भक्षक बन जाये तो रक्षा कौन करे ? कहने का तात्पर्य यह है कि मानवता के अभाव में यह सब होना स्वाभाविक ही है। किसी कवि ने ठीक ही कहा है-

मोटर भी बन रही है, वायुयान बन रहे हैं।

सड़कें भी बन रही हैं, मकान भी बन रहे हैं।।

अस्पताल और शिक्षण संस्थान बन रहे हैं।

इंजीनियर, वकील एवं विद्वान बन रहे हैं।।

धनवान बन रहे हैं, बलवान बन रहे हैं।

श्मशान बन रहे हैं, कब्रिस्तान बन रहे हैं।।

बिजली से आज सुख के सब सामान बन रहे हैं।

सरकार के नित नये-नये प्लान बन रहे हैं।।

यह सब तो बन रहे हैं, पर ये समझ न आया। 

वह कौन सी जगह है, जहॉं इंसान बन रहे हैं।।

सरकार के पास सड़कें बनाने की योजना है। अस्पताल, कॉलेज, मोटर, वायुयान, उद्योग आदि बनाने की योजना है। पर कोई योजना मनुष्य बनाने की नहीं है। जिसके लिए यह सब कुछ बन रहा है, वही बिगड़ रहा है तो इस निर्माण से लाभ के स्थान पर हानि होना अधिक संभव है। इन सड़कों पर डाकुओं की मोटरें दौड़ेंगी। वायुयान तस्करों के प्रयोग में आयेंगे। स्कूल, कॉलेज बदमाशी के अड्डे बन जाएंगे और उद्यान स्वच्छन्द यौनाचार के केन्द्र होंगे।

एक सुन्दर भवन में सुख-सुविधा की समस्त सामग्री उपलब्ध हो, खाने-पीने की प्रचुर सामग्री  उपलब्ध हो और उसका उपभोग कराने के लिए एक पागल व्यक्ति को प्रवेश करा दिया जाये, आप अनुमान कीजिए उस सुविधा का वह क्या उपभोग करेगा? ठीक यही हाल वर्तमान में सरकार कर रही है। सुख-सुविधा के साधन बनाये जा रहे हैं और उन्हें उपभोग करने वाले बिगाड़े जा रहे हैं।

किसी राष्ट्र की ईकाई उसका नागरिक होता है। राष्ट्र के उत्थान व पतन का उत्तरदायित्व उस नागरिक पर होती है। नागरिक की नागरिकता उसकी बुद्धि से प्रेरित होती है। वेदों के प्राण गायत्री मन्त्र की महत्ता इसलिए है कि उसमें प्रभु से किसी भी चीज की प्रार्थना नहीं की गई, मात्र बुद्धि की मांग की गई है। बुद्धि के बने रहने से सब बन जाता है तथा बुद्धि के बिगड़ने से सब बिगड़ जाता है। जिस बुद्धि की इतनी महत्ता गाई गई है, उस बुद्धि का निर्माण होता है हमारी शिक्षण संस्थाओं में। अन्ततोगत्वा हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि किसी भी राष्ट्र का सम्बल उसकी शिक्षा है।

वर्तमान शिक्षा ने इस देश जो को कुछ दिया  है वह किसी से छिपा नहीं है। शिक्षा का उद्देश्य शिक्षार्थी का शारीरिक, आत्मिक व बौद्धिक विकास होना चाहिए। विचारक विचार करें कि क्या इस उद्देश्य की प्राप्ति हमारी शिक्षा से हो रही है? आये दिन शिक्षा में आमूल-चूल परिवर्तन की बात चलती रहती है। न जाने वह परिवर्तन कब और कैसा होगा।

अब तो शिक्षा का उद्देश्य मात्र कुछ अंग्रेजी शब्दों का अशुद्ध उच्चारण तथा विज्ञान व इतिहास की घटनाओं को रट-रटाकर येनकेन प्रकारेण डिग्री लेना मात्र रह गया है। भले ही उसके लिए अवैध प्रयोग ही क्यों न करना पड़े। जिस राष्ट्र की शिक्षण संस्थाओं में परीक्षाएं पुलिस के पहरे में होती हों, उसका भविष्य निश्चित ही अन्धकारमय है।

बुद्धि के विकास के लिए स्वाध्याय आवश्यक होता है। स्वाध्याय का अर्थ है सद्‌ग्रन्थों का अध्ययन व अपना आत्म निरीक्षण। अपना अध्ययन करने की तो आज किसी को आवश्यकता ही नहीं रही है। हम दूसरे की आँखों का तिल देखने के अभ्यस्त हैं, परन्तु अपनी आंख का पहाड़ हमें दिखाई नहीं देता है। ग्रन्थों के अध्ययन के नाम पर आज का युवा ही नहीं प्रौढ़-प्रबुद्ध कहा जाने वाला वर्ग भी हिंसा, बलात्कार, चोरी-डाका व अन्य कामोत्तेजक कथा, साहित्य को पढ़कर ही अपनी आत्मिक पिपासा को शान्त कर रहा है। वेद और शास्त्रों को वह गड़रियों के गीत बताता है। आचार्य डॉसंजय देव

दिव्य युग अप्रैल 2009, Divya yug April 2009

 

 

 

 

 

 

 

 

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