3म्‌ अहमेतान्‌ शाश्वसतो द्वा द्वेन्द्रं ये वज्रं युधयेऽकृण्वत।

आह्वयमानां अव हन्मनाऽहनं दृढा वदन्ननमस्युर्नमस्विन:। 

अथर्ववेद 10.47.6

अर्थ-(ये द्वा द्वा) ये जो दो-दो मिल कर आने वाले (वजं्र इन्द्रं) वज्र धारण करने वाले मुझ इन्द्र को (युधये अकृण्वत) युद्ध करने के लिए प्रेरित करते हैं, (एतान्‌ शाश्वसत:)उन बलशाली दिखाई पड़ने वाले (आह्वयमानान्‌) ललकार कर आगे आने वाले, (नमस्विन:) किन्तु अन्त में झुक जाने वाले, गिड़गिड़ाकर क्षमा मांगने वाले प्रतिद्वन्द्वियों को (अहं अनमस्यु:) कभी न झुकने वाला (दृढा वदन्‌) दृढ और स्थिर वाणी बोलता हुआ मैं (हन्मना) मार डालने का मन बनाकर (अव अहनम्‌) मार गिराता हूँ ।

मनन- दो प्रकार के लोग हैं, नमस्यु और अनमस्यु । नमस्यु वे गुंडे आतंकवादी हैं, जो छोटे दो-दो तीन-तीन के गिरोह बनाकर शक्ति की धौंस जमाते हुए आते हैं । निर्दोष-निरीह-नि:शस्त्र लोगों को लूटते- पीटते- डराते-धमकाते हैं । परन्तु जब शक्तिशाली वज्रधारी से सामना होता है, तो वीरता का मुखौटा उतारकर वे मेमने की तरह मिमियाने लगते हैं । उस समय शक्तिशाली शासक का कर्तव्य है कि वह दृढ वाणी बोले । कभी युद्ध विराम की और शान्ति- समझौते की मृदु वाणी बोलकर भ्रमित न हो  । आक्रमण करने वाले, घर में घुसकर ललकारने वाले शत्रु को मार डालने का पक्का मन बनाये । सदा अनमस्यु रहकर, कभी न झुकने वाला बनकर दृढ चित्त से आततायी शत्रु को मार ही डाले । आखिर वज्र है किसलिए ?

आतंकवादी और धौंस जमाने वाले शत्रुओं से चाहे वे पूर्व से आते हों  चाहे पश्चिम से, चाहे वे नागालैंड में हो  चाहे कश्मीर में, निपटने का एक ही तरीका है, संकल्प  अनमस्यु रहने का हो, वाणी दृढ और स्थिर रहे और मन शत्रु का समूल नाश करने का हो ।

आक्रमण करने वाला शत्रु है, यह बात स्पष्ट रूप में समझ ली जाये, पक्के तौर पर मान ली जाये । वह भी अपना ही भाई है, अपना ही खून है, यह बात मन से सदा के लिए निकाल दी जाये । कैंसर की गांठ शरीर का अपना अंग नहीं होती । वह मृत्यु का अग्रदूत होती है । उसे काटकर निकाल फेंकना ही वांछनीय और परम आवश्यक होता है ।

आततायी, हथियार लेकर मारने के लिए आने वाला व्यक्ति कभी भी दया का, समझौते का, शान्ति वार्ता का पात्र नहीं है । बलहीन और निस्तेज  लोग ही ललकारने वाले आतंकवादी से समझौता करने की इच्छा रखते हैं । कूटनीति के नाम पर घुटने टेकते हैं । कभी युद्ध विराम करते हैं, कभी युद्ध शुरु करते हैं । न उनका मन दृढ होता है, न वाणी दृढ  होती है । इससे प्रतिस्पर्धी हमलावर का हौसला बढता है । यदि दृढवाणी में कह दिया जाये कि आतंकवादी से कोई समझौता नहीं होगा, उसे मार डालना ही हमारा लक्ष्य है और उसे मार डालने का हम मन बना लें, तो हम आक्रमणकारी को अवश्य ही मार गिरायेंगे । डावांडोल चित्त, गोलमोल वाणी, शान्ति वार्ता, ये विजय में बाधक हैं । अनमस्यु नमस्युओं पर सदा विजयी होता है ।

कट जाय सिर, न झुकना,

यह मंत्र जपने वाले वीरों का,

जन्मदाता यह देश हो हमारा ।

संकल्प में बहुत बड़ी शक्ति होती है । यह सोई हुई आँधी के समान होता है । आँधी में अत्यधिक शक्ति होती है । विशालकाय पेड़ों को भी उखाड़कर आँधी फेंक देती है । परन्तु जब तक वह सोई रहती है, तब तक एक तिनके  को भी नही उड़ा सकती । इसका अर्थ यह नहीं है कि वह कमजोर है, अपितु उसने अपनी शक्ति को प्रकट नहीं किया । ठीक यही हाल आज के युवक की संकल्प शक्ति का है । जब तक युवक अपने आपको दीन-हीन और मुर्दों जैसा समझते रहेगे तब तक ये दीन-हीन ही बने रहेगे और कभी भी उत्साह तथा जिन्दादिली पास में फटक भी नहीं सकेगी । आचार्यश्री डॉ.संजयदेव के प्रवचनों से संकलित दिव्य सन्देश

 

 

 

 

 

 

 

 

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