आज देश में सर्वत्र कंगाली, गरीबी को दूर करने का क्रंदन हो रहा है। गरीबी को मिटाने की अनेक योजनाएँ चल रही हैं, किन्तु गरीबी मिट नहीं रहीं क्योंक्ति योजनाएँ लगड़ी हैं। केवल पेट की पूर्ति तो अन्न कर सकता है। यदि पेट की पूर्ति से बचा धन प्रजा के कल्याण में लगाया जाए तो जो आध्यात्मिक शांति अनुभव होगी वह ऊँची नाक के सुख से कहीं ऊँची होगी। जिस देश की प्रजा में इस प्रजा के सुख अनुभव करने वाले त्याग धन पुरुषों को सबसे ऊँचा माना जाए वहाँ ऊँचा हृदय तथा नाक दोनों एक दिशा में बढ़ते हैं तब प्रजा की कंगाली बहुत आसानी से दूर हो जाती है, क्योंकि पेट पालने के लिए हर व्यक्ति श्रम करता है और पेट पालने में बची हुई शक्ति सब एक-दूसरे की सहायता में लगाते हैं।
शतपथ ब्राह्मण में एक आख्यायिका आती है- एक समय किसी धनी पुरुष ने देवों तथा असुरों को अपने यहाँ निमन्त्रण पर बुलाया। पहले देवों को भोजन परोसा जाता है जब देव खा चुकते हैं तब असुरों का नम्बर आता था। इस बार असुरों ने उस धनी पुरुष से यह शर्त रखी कि हम इस प्रकार अपमानित होकर भोजन नहीं करना चाहते। हर बार देवों को पहले भोजन मिलता है हम क्या उनसे विद्या, बुद्धि, बल में कम हैं। अतः पहले भोजन हमें मिलना चाहिए। धनी ने कहा- अच्छा पहले पीछे की बात छोड़ो, दोनों को एकसाथ भोजन दे देंगे, किन्तु शर्त यह कि सबकी कोहनियों को बाँध दिया जाएगा। असुरों ने शर्त स्वीकार कर ली। फिर क्या था। एक पंक्ति में देवों को बिठा दिया गया और दूसरों को असुरों को। देवों ने एक-दूसरे के सामने बैठने की शर्त सहित असुरों के साथ भोजन करना स्वीकार किया था, अतः एक ही पंक्ति में वह आमने-सामने बैठ गए असुर अलग-अलग। दोनों की कुहनियों पर पट्टी रखकर कसकर बाँध दिया गया जिससे उनकी बाहें न मुड़ सकें और सुस्वादु विभिन्न व्यंजन दोनों के समक्ष परोसकर भोजन करने का निवेदन किया गया।
असुर बड़ी उलझन में पड़ गए गुलाब जामुन, बालूशाही, पेड़ा जो भी उठाया जाए वह मुँह में पहुँचने की बजाय सिर से भी ऊपर से निकल गया क्योंकि बाँह तो मुड़ नहीं सकती थी, किन्तु देवों को कुछ भी कठिनाई नहीं हुई। बाँह बिना मोड़े अपने हाथ से भोजन उठाकर अपने सामने वाले पड़ोसी के मुख में देना प्रारंभ कर दिया और इस प्रकार एक-दूसरे की सहायता से भरपेट भोजन कर रसस्वादन किया जबकि असुरों को भूखा ही उठना पड़ा।
बस यह पड़ोसी के मुख में भोजन देने से प्राप्त होने वाला आध्यात्मिक सुख ही कंगाली को दूर करने का एकमात्र साधन है। आलस्य श्रम की टाँग तोड़ देता है और तृष्णा त्याग की। असुर लोग अपने-अपने मुख में भोजन करते हैं देव एक-दूसरे के मुख में बस इसीलिए देव बनने की आवश्यकता है। आज आलस्य को दूर करने की महिमा तो खूब गाई जा रही है अनेक योजनाएँ बन रही हैं किन्तु तृष्णा को ऊँचे स्तर कळसह ीींरपवरीव ेष श्रर्ळींळपस का नाम दिया जा रहा है। इसलिए तृष्णा की वृद्धि से धन की वृद्धि और धन की वृद्धि से हाय कंगाली का क्रंदन बढ़ता जा रहा है, इसलिए अनैतिकता बढ़ती जा रही है। जब तक तृष्णा के स्थान पर त्याग की यज्ञमय, दानमय जीवन की प्रतिष्ठा नहीं की जाती तब तक अनैतिकता को कम या समाप्त नहीं किया जा सकता।
दान हृदय की उदारतारूप वृत्ति का प्रकाश है। जो मनुष्य दुर्बल दीन-दुःखी जन को अन्न प्रदान नहीं करता, आगे खड़े को, घर आए को देखकर मन कड़ा कर लेता है, अपने काम-धन्धे में मग्न रहता है ऐसे कठोर अन्तःकरण के मनुष्य को सुख नहीं प्राप्त होता।
भौतिक सुख-सामग्री को तुच्छ समझना ही तृष्णा को जीतने का सर्वश्रेष्ठ उपाय है। तृष्णा विजय पर ही सुख-शांति निर्भर है। केवल भौतिक सामग्री का प्रचुर उत्पादन कंगाली को दूर नहीं कर सकता। हाँ, उत्पादन तो अवश्य बढ़ाया जाए किन्तु तृष्णा विजय की साधना भी साथ ही साथ हो। ये ही दो पैर हैं जिनके आधार पर समाज सुख-शांति की ओर अग्रसर हो सकता है।
अतः यदि देश से अनैतिकता को दूर भगाना है और सच्ची सुख-शांति प्राप्त करनी है तो यह तथ्य समझना होगा कि रोग पेट में नहीं नाक में है। नाक का अर्थ है तृष्णा। पेट भरो नाक छोटी करो। पेट भरने के पश्‍चात् जो बचे उसे नाक लम्बी करने में मत लगाओ। उसे मानव समाज की निष्काम सेवा से उत्पन्न होने वाले अध्यात्मिक आनंद की प्राप्ति में लगाओ। अन्यथा सारी योजनाएँ और आंदोलन लंगड़े ही रहेंगे। चरित्रवान् मानव निर्माण की योजना बनाओ। चरित्रवान् मानव निर्माण का एक ही साधन है- आध्यात्मिक आनन्द द्वारा तृष्णा पर विजय। पेट भरो। नाक सिकोड़ो। तृष्णा को जीतो आत्मा का राज्य स्थापित होगा, लंगड़ापन दूर होगा दोनों पैर एक साथ प्रगति की ओर अग्रसर होंगे और दोनों के सहारे संसार में सुख-शान्ति मिल सकेगी।
तृष्णा जीतना ही शान्ति का मार्ग है। सुख और शान्ति एक नहीं है। सुख का आधार शरीर है जबकि शांति का आधार मन और बुद्धि तथा आनन्द और परमानन्द का आधार एकमात्र आत्मा है। जब तक नाक ऊँची करने के लिए तृष्णा को नहीं जीता जाएगा, मन में शांति नहीं होगी और मन में शांति नहीं होगी तो आत्मा में आनन्द भी नहीं होगा। मन के असन्तुष्ट अशांत रहने पर इन्द्रियों की सन्तुष्टि असम्भव है फिर सुख और शांति कहाँ से मिलेगी? अतः तृष्णा को जीतकर मन को शांत करने का प्रयास करो इन्द्रियाँ भी शांत हो जाएँगी, सन्तुष्ट होंगी और रथ बेकाबू नहीं होगा तब वास्तविक सुख-शांति और आनन्द की अनुभूति होगी।
विश्‍वशांति का महत्वपूर्ण आधार वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना है। जब सबमें एक ही चैतन्य सत्ता विद्यमान है तब आपस में द्वेष एवं घृणा क्यों? पारस्परिक सहयोग के बिना सबका अस्तित्व खतरे में है। मनुष्य की वर्तमान दुर्दशा का कारण आर्थिक राजनीतिक भौतिक नहीं, बल्कि हृदय की संकीर्णता है जो मात्र तृष्णा के कारण है। इसी से नैतिकता का अभाव हो गया है। जो जीवन की विभिन्न क्षेत्रों में व्याप्त विषमता को जन्म देता है। मानवीय अन्तःकरण में नैतिकता का उदय तृष्णा विजय पर ही सम्भव है। तृष्णा का त्याग उदारता लाएगा। किन्तु त्याग कहने की वस्तु नहीं है वह तो आचरण की वस्तु है। जो तृष्णा को जीत लेगा वह त्याग को भी प्राप्त कर लेगा। देशभक्ति बिना त्याग के सम्भव नहीं मनुष्य का अपना स्वरूप त्याग से ही निखरता है, त्याग की कितनी शक्ति है- महाराज वीरसेन अपनी राज्यसभा में बैठे थे। राज्य को विभिन्न समस्याओं पर विचार-विमर्श हो रहा था। उसी विचार-विमर्श के बीच वीरसेन ने अपने मन्त्री से पूछा- शांतिदेव का कुछ पता लगा? नहीं। बहुत प्रयत्न करने पर भी हम उनका पता नहीं लगा सके। हम इसके लिए लज्जित हैं। महाराज! मन्त्री ने उत्तर दिया। उन्हें बंदी बनाकर लाने वाले के लिए पाँच हजार मुद्राओं का पुरस्कार भी घोषित कर दिया गया है। एक दूसरे सभासद ने कहा। एक तीसरे सभासद ने चाटुकारिता दिखाते हुए कहा- उन्हें हम शीघ्र ही बन्दी बनाने में सफल होंगे। एक अन्य सदस्य कहने लगा- वे किस वेश और स्थिति में है इसका अभी हमें कोई अनुमान नहीं लगा है। वह जीवित हैं या नहीं यह भी नहीं कहा जा सकता।
महाराज वीरसेन गम्भीर थे। ऐसा प्रतीत होता था कि इन सबके उत्तर से उन्हें तनिक भी सन्तोष न था। उनकी गम्भीरता को देखकर सभा में सन्नाटा छा गया। वातावरण में नीरवता को भंग करते हुए महाराज ने कहा - मैं एक सप्ताह का समय और देता हूँ। इस अवधि में महाराज शांतिदेव का पता लगा ही लिया जाना चाहिए।
वीरसेन विशाल साम्राज्य के स्वामी थे। उनकी वीरता पराक्रम और पुरुषार्थ की कीर्ति दूर-दूर तक फैली हुई थी। शांतिदेव उन्हीं के अधीनस्थ एक राज्य के राजा थे। उनकी उदारता, सेवाभावना और क्षमाशीलता की चर्चा लोककथाओं के रूप में होने लगी थीं। दीन-दुखियों की सहायता ही उनके जीवन का लक्ष्य था। न धन से मोह न पद की इच्छा चिन्ता। राज्य कोष का धन प्रजा के हित में लगाने में तनिक भी नहीं हिचकते। वे वस्तुतः अपनी प्रजा के हृदय सम्राट थे। उनकी कीर्ति के प्रति ईर्ष्यालु प्रतिस्पर्थियों ने महाराज वीरसेन से शिकायत की- दान दक्षिणा का बहाना बनाकर शांतिदेव सारा धन आमोद- प्रमोद में लुटा रहे हैं। उनके इन कामों पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए।
वीरसेन ने इस सम्बन्ध में शांतिदेव से पूछताछ की। उन्हें शांतिदेव की नीयत पर तो सन्देह न था, किन्तु यह भी उन्हें अच्छा नहीं लगा कि शांतिदेव की दानशीलता उनके पुरुषार्थ से अर्जित यश को आच्छादित कर दे। वीरसेन शांतिदेव का अहित नहीं चाहते थे, पर सुयश की लिप्सा प्रायः मनुष्य पर अहं का एक ऐसा झीना आवरण डाल देती है, जिसे समझना कठिन और हटाना विषम होता है।
एक दिन शांतिदेव को वीरसेन का संदेशा मिला- आपके विरुद्ध मेरे पास कई शिकायतें आई हैं। उन्हीं की जानकारी के लिए मैं स्वयं आ रहा हूँ। अपनी इच्छा के विपरीत विवशतापूर्वक मुझे यह अप्रिय कार्य करना पड़ रहा है।
शांतिदेव को स्थिति का अनुमान हो गया। उन्हें क्या करना है इसका भी उन्होंने तत्काल निर्णय कर लिया। एक सप्ताह बाद जब महाराज वीरसेन ने नगर में प्रवेश किया तो द्वारपाल ने विनयपूर्वक उन्हें चाबी का एक गुच्छा और पत्र दिया। चाबियाँ थीं राजकोष की और पत्र इस प्रकार था- मुझे खेद है कि मेरे कारण आपको यहाँ आने का कष्ट करना पड़ा जिस प्रकार मैंने अभी तक अपना जीवन व्यतीत किया है उसमें परिवर्तन करना मेरे लिए सम्भव नहीं है। अतः अत्यन्त विनयपूर्वक मैं आपसे विदा लेता हूँ विश्‍वास मानिए कि मेरे पास जाते समय राज्यकोष की मुद्रा भी नहीं है।
महाराज वीरसेन पत्र पढ़कर हतप्रभ हो गए। राज्यकोष का हिसाब-किताब बिलकुल ठीक था। प्रजा सुख-शांति से जीवन व्यतीत कर रही थी, किन्तु उसके हितों का सच्चा प्रहरी उन्हें छोड़कर जा चुका था। वीरसेन ने शांतिदेव का पता लगाने की चेष्टा की पर अपने प्रयास में वे असफल रहे। वे वापस लौट गए। राजाज्ञा से शांतिदेव को विद्रोही घोषित कर दिया गया।
आज सप्ताह का अन्तिम दिवस था। राज्यसभा में सब लोग गम्भीर मुद्रा में थे। सबको इस बात की चिन्ता थी कि शांतिदेव का पता न लगा सकने पर महाराज अवश्य क्रुद्ध होंगे। किसी को दण्ड भी दे सकते हैं अपनी अवज्ञा के अपराध में।
सहसा बाहर कुछ कोलाहल-सा हुआ और दूसरे ही क्षण सभासदों ने बड़े आश्‍चर्य के साथ देखा कि एक दीन हीन भिखारी ने राज्यसभा में प्रवेश किया है। उसके पीछे फटे-पुराने कपड़े पहने शांंतिदेव भी चले आ रहे हैं।
महाराज वीरसेन एक क्षण के लिए सिंहासन से उठे फिर बैठते हुए बोले- शांतिदेव को यथास्थान बिठाओ। दीनहीन भिखारी भय से कांपता हुआ दरवाजे के पास खड़ा हो गया महाराज वीरसेन के आग्रह पर उसने अपनी बात बताई-
मैं अत्यन्त निर्धन किसान हूँ। थोड़ी-सी खेती के सहारे मैं किसी प्रकार अपना परिवार पाल रहा था। पिछले वर्ष सूखे में फसल नष्ट हो गई। उधार लेकर बच्चों का पेट भरना पड़ा। उधार के रुपए न चुका सकने के कारण महाराज ने मेरी जमीन छीन ली। अब मेरे पास जीविका का कोई साधन न रहा। बच्चे भूखे मर रहे हैं।
पर शांतिदेव तुम्हें कहाँ मिले और तुम इन्हें यहाँ क्यों लाए? वीरसेन ने बीच में ही टोका। बतलाता हूँ महाराज! कल रात को मैं इसी सोच-विचार में डूबा भगवान को कोस रहा था तो घूमते हुए यह मेरे पास पहुँच गए। मेरी विपदा सुनी और दुखित होकर बोले- मुझे महाराज वीरसेन के पास पहुँचा दो। मेरे पहुँचते ही तुम्हें पाँच हजार मुद्राएँ मिल जाएँगी। मैं कुछ बात न समझ सका। इनके बार-बार आग्रह करने पर ही मैं इन्हें यहाँ लाया हूँ। अब जैसी आज्ञा दें आप। भिखारी घबरा रहा था। महाराज वीरसेन ने भिखारी को कहा- घबराओ नहीं और तुरन्त कोषाधिकारी को बुलाकर पाँच हजार मुद्राएँ देकर भिखारी को विदा कर दिया। सभासदों को अपने-अपने घर जाने के आदेश हुए। सब चले गए तब उस कक्ष में रह गए केवल महाराज वीरसेन और शांतिदेव।
वीरसेन- तुम्हें व्यग्रतापूर्वक खोज रहा था शांतिदेव! तुम्हें पाकर मैं बहुत प्रसन्न हूँ ।
शांतिदेव- विजय का हर्ष किसे नहीं होता महाराज! मैं अपना अपराध स्वीकार करता हूँ आप मुझे दण्ड दें।
वीरसेन- दण्ड दूँगा। क्या मेरे लिए दण्ड को स्वीकार करोगे?
शांतिदेव- क्यों नहीं महाराज! राजाज्ञा की उपेक्षा करने का साहस कोई समर्थ भी नहीं करता फिर मैं तो ठहरा असमर्थ असहाय।
वीरसेन- तो सुनो मेरी दण्ड व्यवस्था यह है कि तुम फिर अपने राज्य का पूर्ववत् संचालन करो और दूसरों को सुख-शांति के लिए अपनी सब शक्ति और क्षमता का पूर्णरूप से उपयोग करो।
महाराज वीरसेन कुछ क्षण रुककर पुनः आश्‍वस्त स्वर में बोले - तुम्हारे मेरे बीच परोक्ष रूप से एक प्रतिस्पर्धा चल रही थी। मैं तुम्हारे यश के प्रति ईर्ष्यालु था। पर तुमने तो अपनी त्याग शक्ति से मुझे चिरकाल के लिए पराजित कर दिया। मैं अपनी पराजय को स्वीकार करता हूं शांतिदेव और फिर इसके पहले कि शांतिदेव कुछ कहते महाराज बोले- सच कहता हूं शांतिदेव आज मेरे लिए पराजय का यह हर्ष असह्य हो रहा है और इतना कहते-कहते महाराज वीरसेन ने शांतिदेव के चरणों में अपना मस्तक रख दिया।
सचमुच त्याग में बड़ी शक्ति है।

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