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गोवंश की रक्षा से आर्थिक-समृद्धि

भारतवर्ष में आदि सृष्टि से ही गाय को माता की तरह पूज्य माना गया है। यदि यह कहा जाये कि गाय भारत की कामधेनू है तो अतिशयोक्ति नहीं है। उसका हमारे लिए केवल धार्मिक महत्व ही नहीं, प्रत्युत आर्थिक महत्व सर्वाधिक है। यथार्थ में गाय की आर्थिक उपयोगिता के कारण ही गाय को "कामधेनु' कहा गया है। हमारा देश एक कृषि प्रधान देश है। यहॉं 80 प्रतिशत जनता ग्रामीण अंचल में रहकर कृषि पर आश्रित है और कृषि का कार्य गाय के बछड़ों, गोबर आदि के बिना कदापि सम्भव नहीं है। महर्षि दयानन्द जो इस युग के महान्‌ सुधारक थे, उन्होने ठीक ही लिखा है- ""गौ आदि पशुओं के नाश से राजा प्रजा दोनो का नाश होता है।''

महर्षि दयानन्द ने गाय आदि पशुओं का महत्व बहुत ही दूरदर्शिता से समझाया। उनके जीवन की अन्तिम इच्छा यही थी कि भारत में गोवंश का रक्षण होना चाहिए। उसके लिए उन्होंने अनेक प्रयास किए- जैसे गोरक्षा के महत्व समझाने के लिए "गोकरुणानिधि' पुस्तक लिखी, तत्कालीन प्रशासक लार्ड ब्रुक आदि को गोरक्षा का महत्व समझाया तथा भारत की इस हार्दिक भावना को महारानी विक्टोरिया को पहुँचाने के लिए लाखों हस्ताक्षर कराने का अभियान चलाया और भारतीय राजाओं को इस महत्वपूर्ण कार्य के लिए प्रेरित किया। परन्तु विधि की विडम्बना ही कहनी चाहिए कि उनकी जीवन-लीला के शीघ्र समाप्त हो जाने के कारण से यह कार्य पूर्ण न हो सका। गोवंश के आर्थिक महत्व को समझाते हुए महर्षि लिखते हैं ""जो एक गाय न्यून से न्यून दो सेर दूध देती हो और दूसरी बीस सेर तो प्रत्येक गाय के ग्यारह सेर दूध होने में कुछ भी शंका नहीं है। इस हिसाब से एक मास में सवा आठ मन दूध होता है। एक गाय कम से कम 6 महीने और दूसरी अधिक से अधिक 18 महीने तक दूध देती है तो दोनों का मध्यभाग प्रत्येक गाय के दूध देने में बारह महीने होते हैं। इस हिसाब से बारह महीनों का दूध निन्नानवे मन होता है। इतने दूध को औटाकर प्रति सेर में छटांक चावल और डेढ़ छटांक चीनी डालकर खीर बनाकर खावें तो प्रत्येक पुरुष के लिए दो सेर दूध की खीर पुष्कल (पर्याप्त) होती है। क्योंकि यह भी एक मध्य भाग की गिनती है अर्थात्‌ कोई दो सेर दूध की खीर से अधिक खा गया और कोई न्यून, इस हिसाब से एक प्रसूता गाय के दूध से 1980 (एक हजार नौ सौ अस्सी) मनुष्य एक बार तृप्त होते हैं। गाय न्यून से न्यून 8 और अधिक से अधिक 18 बार बच्चे जनती है। इसका मध्यभाग तेरह बार आया तो 25740 (पच्चीस हजार सात सौ चालीस) मनुष्य एक गाय के जन्मभर के दूधमात्र से एक बार तृप्त हो सकते हैं।

इस गाय के एक पीढ़ी में छः बछिया और सात बछड़े हुए। इनमें से एक की मृत्यु रोगादि से होना सम्भव है तो भी बारह रहे। उन छः बछियाओं के दूधमात्र से पूर्व उक्त प्रकार से 154440 (एक लाख चौवन हजार चार सौ चालीस) मनुष्यों का पालन हो सकता है। अब रहे छः बैल, उनमें एक जोड़ी से दोनों साख में 200 (दो सौ) मन अन्न उत्पन्न हो सकता है। इस प्रकार तीन जोड़ी 600 (छः सौ) मन अन्न उत्पन्न कर सकती हैं, और उनके कार्य का मध्यभाग आठ वर्ष है। इस हिसाब से 4800 (चार हजार आठ सौ) मन अन्न उत्पन्न करने की शक्ति एक जन्म में तीनों जोड़ी की है। 4800 मन अन्न से प्रत्येक मनुष्य का तीन पाव अन्न भोजन में गिनें तो 256000 (दो लाख छप्पन हजार) मनुष्यों का एक बार भोजन होता है। दूध और अन्न को मिलाकर देखने से निश्चय है कि 410440 (चार लाख दस हजार चार सौ चालीस) मनुष्यों का पालन एक बार के भोजन से होता है। अब छः गायों की पीढ़ी दर पीढ़ियों का हिसाब लगाकर देखा जावे तो अंसख्य मनुष्यों का पालन हो सकता है। और इसके मांस से अनुमान है कि केवल अस्सी मांसाहारी मनुष्य एक बार तृप्त हो सकते हैं। देखो! तुच्छ लाभ के लिए लाखों प्राणियों को मार असंख्य मनुष्यों की हानि करना महापाप क्यों नहीं।'' (गोकरुणानिधि से)

महात्मा गांधी ने भी गाय का आर्थिक विश्लेषण करते हुए कहा था-

(क) ""आज तो गाय मृत्यु के किनारे खड़ी है और मुझे यकीन नहीं कि अन्त में हमारे प्रयत्न उसे बचा सकेंगे। लेकिन वह नष्ट हो गई तो उसके साथ ही हम भी यानी हमारी सभ्यता भी नष्ट हो जायेगी।''

ख) ""हमारे ऋषि मुनियों ने हमें उपाय बता दिया है। वे कहते हैं कि गाय की रक्षा करो, सबकी रक्षा हो जायेगी। ऋषि ज्ञान की कुंजी खोल गये हैं, उसे हमें बढ़ाना चाहिए, बर्बाद नहीं करना चाहिए।'' (सित. 86 के "गोधन' से साभार)

लार्ड लिनलिथगो (वायसराय) ने कहा था- ""भारत में गाय अपनी पीठ पर सम्पूर्ण आर्थिक ढांचे का भार सम्भाले हुए है।''

प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. एलबर्ट आईन्स्टीन ने एक सन्देश में कहा था- ""भारत ट्रेक्टर, उर्वरक, आदि का इस्तेमाल खेती के लिए न करे। भारत को अपनी खेती का आधार गाय और बैल को ही रखना चाहिए।''

अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति कार्टर के शब्द हैं- "गोबर गैस ऊर्जा का अक्षय स्त्रोत है।''

प्रसिद्ध वैज्ञानिक (अमेरिका) डोनाल्ड क्लांस का प्रधानमन्त्री राजीव गांधी को सुझाव- ""भारत अपने पशुधन की रक्षा करे तो उससे 2.28 करोड़ बैरल पैट्रोलियम जितनी ऊर्जा प्राप्त होगी।''

गाय दूध देने वाली "डेरी' है। खाद देती है इसलिए "फर्टीलाईजर' प्लांट है। बैल के रूप में "ट्रेक्टर' है और माल ले जाने के लिए "ट्रक' है। मनुष्य की ये सारी आवश्यकताएं वह घास खाकर पूर्ण करती है, यह उसकी सबसे बड़ी विशेषता है। गाय और बैल खुद घास और भूसा खाकर मनुष्य को दूध, अन्न, ऊर्जा देते हैं।

राष्ट्रीय आय में गोपालन का मुख्य स्थान है। हमारे देश में पशु ऊर्जा से पैदा होने वाली विद्युत ऊर्जा अन्य स्रोतों से पैदा होने वाली विद्युत ऊर्जा से कई गुणा ज्यादा है। पशु ऊर्जा के लिये पूंजी जुटाने की कोई समस्या सरकार के सामने नहीं है। गोधन के प्रति उपेक्षा तथा लापरवाही के बावजूद राष्ट्रीय आय में उसका योगदान अन्य विशाल तथा मध्यकाय उद्योगों से कम नहीं है।

गोपालन से आर्थिक समृद्धि होती है। आज के भौतिक युग में प्रत्येक व्यक्ति का दृष्टिकोण आर्थिक लाभ रहता है। गोवध करने वाले भी लाइसेंस लेकर बड़े-बड़े बूचड़खाने खोलते हैं, चोरी छिपे गायों, बैलों, बछड़ों व बछड़ियों को मारकर उनके मांस, चमड़ा आदि को बेचकर अथवा निर्यात कर धनार्जन करते हैं। किन्तु वे इस महापाप कर्म को छोड़कर गोपालन जैसे पुण्यात्मक कर्म को करने लगें तो उन्हें घाटे का सौदा नहीं रहेगा।

परमेश्वर ने गाय को बहुत ही उपयोगी तथा आर्थिक समृद्धि करने के लिए बनाया है। महाराजा दिलीप, नन्द बाबा, योगेश्वर श्रीकृष्ण आदि महान्‌ पुरुषों के उत्तम चरित्र इतिहास में सर्वविदित हैं। वेदों में गायों को "अमृतस्य नाभिः' कहा है। भारतीय संस्कृति में गाय को "कामधेनु' नाम दिया गया है। गाय को सर्वविध उन्नति देने के कारण ही भारतवासी "माता' कहकर पुकारते हैं। किन्तु आवश्यकता इस बात की है कि वर्तमान युग में गाय को कैसे कामधेनु बनाया जाये। विदेशी शासकों की दुरभिसन्धि के कारण भारतीय गायों की नस्ल को बिगाड़ने से गायों की शोचनीय दशा हो गई है। समस्त गोभक्तों को ऐसे उपायों व साधनों की खोज करनी चाहिए कि जिससे गायें 40-50 किलो दूध देने लगे और गायों के प्रति पूर्ववत्‌ श्रद्धा जागृत हो सके।

गायों को समृद्धिप्रद बनाने के लिए हमें दूसरे विदेशों से भी शिक्षा लेनी चाहिए। अमेरिका, कनाड़ा, डेनमार्क, जर्मनी, फ्रांस, इंग्लैण्ड आदि देशों में भैंसों का नाम भी नहीं है। गायों के पालन व संवर्धन से ही ये देश न केवल अपने देश को ही समृद्ध बना रहे हैं, प्रत्युत विदेशों को भी निर्यात कर विदेशी मुद्रा कमा रहे हैं। भारत देश में (प्राचीन युग में) दूध-घी की नदियां बहती थी, हम भी अपने देश को फिर से समृद्ध बना सकते हैं। दूध, दही, घी इत्यादि पदार्थों के प्रचुर मात्रा में मिलने से हमारे देश के बालक व युवा बलवान, बुद्धिमान, आयुष्मान्‌ तथा स्वस्थ रहेंगे और हमारी अभिशाप  बनी गरीबी समूल नष्ट हो सकेगी। (Divya Yug 2008) अक्टूबर 2008

 

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