बुद्धिमान् और मूर्ख में यही भेद है कि बुद्धिमान् रद्दी से रद्दी पदार्थ को अपने बुद्धि-कौशल से उपयोगी बना लेता है, दूसरी ओर मूर्ख मनुष्य अच्छे से अच्छे पदार्थ को अपने विपरीत बुद्धि-कौशल से पीड़ोत्पादक बना लेता है। बुद्धिमान् काजल को आंख में डालता है, मूर्ख मुंह पर मल लेता है। बुद्धिमान् नमक को उचित मात्रा में दाल शाकादि व्यंजनों में डालकर उत्तम स्वादु भोजन बना लेता है, मूर्ख उसे आंख में डालकर रड़क उत्पन्न करता है। बुद्धिमान ने डेगची का ढकना उछलते देखा तो आग-पानी को उचित ढंग से मिलाकर रेल ईंजन बना लिया, मूर्खों ने इकट्ठा किया तो हुक्का बना लिया और गुड़गुड़ाकर रह गये।
प्रभु-भक्ति से बढ़कर लोक-कल्याणकारी वस्तु संसार में और क्या हो सकती है? परन्तु हमारे देश के मूर्खों ने यदि अपनी सबसे अधिक हानि की है, तो इस भक्ति द्वारा।
कृष्ण महाराज की गीता अथवा सच पूछिये तो द्वैपायन कृष्ण द्वारा वार्ष्णेय कृष्ण के गीता रूप में उपनिबद्ध विचार इस उल्टी भक्ति को समूलोच्छेद करने के लिए ही प्रकट किये गये थे। भक्ति का उद्देश्य है कि मनुष्य अपने आपको इस प्रकार समझे कि मानो वह एक मजदूर है और यदि उसने अपने काम में सुस्ती की, तो वह अपने स्वामी से चोरी करके कहीं बचकर नहीं जा सकता। उसे विश्राम भी करना है, परंतु वह विश्राम भी मजदूरी का अंग है। इधर स्वामी ऐसा है जो उसकी मजदूरी का समस्त फल उसे ही दे देता है, अपने पास कुछ नहीं रखता। दूसरे वह अन्तर्यामी भी है। संसार के स्वामी बाहर खड़ा होकर पहरा देते हैं, किन्तु वह प्रभु अन्दर-बाहर सब जगह खड़ा पहरा दे रहा है।
बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च। सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् ॥ (गीता 13/15)
तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः। (यजुर्वेद 40/5)
वेद कहता है-कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेत्। (यजुर्वेद 40/2) इस संसार में कर्म करते हुए ही जीने की इच्छा करे। अर्थात् बिना पुरुषार्थ जीवन बिताने की इच्छा भी न करे। स्वामी कण-कण में बैठा है। ''ईशावास्यमिदं सर्वम्'' (यजु. 40/1) बस इसकी ही व्याख्या गीता में की गई है। वह कर्म किस प्रकार का हो? ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्व भूतहिते रताः। (गीता 12/4) जो अव्यक्त रूप से भगवान् की भक्ति करते हैं वे भी मुझ तक ही पहुंचते हैं । क्योंकि वे सर्वभूतहित में पूर्ण परायणता से लगे हुए हैं, इसी में रमण करते हैं अर्थात् पूर्ण रसास्वाद करते हैं। यह सर्वभूतहितकारी कर्म हमारे जीवन का अंग कैसे बने ?
हम ब्राह्मणत्व, क्षत्रियत्व, वैश्यत्व अर्थात् ज्ञान द्वारा अज्ञान का नाश (ब्राह्मणत्व), न्याय द्वारा अन्याय का नाश (क्षत्रियत्व), धनदान द्वारा दरिद्रता का नाश (वैश्यत्व), इन तीन व्रतों में से एक व्रत को अग्रि रूप में अपने आत्मा में धारण कर लें-यही सच्च भक्ति मार्ग है यही संन्यास है, इससे विपरीत कुछ नहीं।
न निरग्रिः (गीता 6/1) केवल प्रतीक रूप अग्रि अथवा लोक के समक्ष दीक्षा-मन्त्र का उच्चरण करना, नित्य अग्रिहोत्र करना पर्याप्त नहीं ।
न चाक्रियः (गीता 6/1) उस व्रत के अनूकुल ही आचरण करना। क्रियाहीन अग्रि प्रतीक मात्र है और कुछ नहीं। शूद्र अग्रि के बिना भी किसी अग्रिवाले की सेवा में लगकर परमगति पा सकता है, परन्तु क्रियाहीन कुछ नही पा सकता। हर मनुष्य सबके सब व्रत एक साथ नहीं निभा सकता। इसलिए उसे अपने स्वभावनुकूल ब्राह्मणत्व, क्षत्रियत्व, वैश्यत्व में से एक न एक कर्म चुन लेना चाहिए। वह उसका स्वयं चुना हुआ कर्म है, इसलिए स्वकर्म कहलाता है। बस यही स्वकर्म ईश्वर भक्ति का एकमात्र साधन है।
स्वकर्म्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः (गीता 18/46) - उस
अपने स्वयं चुने हुए स्वकर्म द्वारा उस भगवान की अभ्यर्चना करके मनुष्य मात्र सिद्धि प्राप्त करता है। वर्णो वृणोतेः (निरुक्त-प्रथम कांड /14) यही वरण करना ही वर्णत्व है। अठारहवें अध्याय में 41 से 44 वें श्लोक तक ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र तक के स्वभावों का निरूपण किया है। अब मनुष्य अपने स्वभाव को देखे, पहिचाने, स्वयं जानने की शक्ति न हो तो प्रणिपातेन, परिप्रश्नेन, सेवया (विद्वानों के चरणों में प्रणाम करके, उनसे छानबीन करके, उनकी सेवा करके-गीता 4-34) इस बात का ज्ञान प्राप्त करे और स्ववर्णोचित गुण सम्पादन करे।
इसलिए कहा- चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्म्मविभागशः। तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्त्तारमव्ययम्॥ (गीता)
हे अर्जुन! इस युग में गुणकर्मानुसार चातुर्वर्ण्य नष्ट हो गया था। मैंने उसकी इस युग में सृष्टि की है। परन्तु इस गुण-कर्मानुसारिणी स्वभाव वर्णाश्रित वर्ण-व्यवस्था का अव्यय अर्थात् अनादि अनन्त शाश्वतकर्त्ता तो भगवान् है, जिसने पुरुष सूक्त में इसका उपदेश किया है। इसलिए मुझे इसका शाश्वतकर्त्ता न समझ लेना। (अहो सत्यपराणता! अहो विनम्रता!)
हे अर्जुन! यह ''स्वकर्म्मणा'' सामने सेवक रूप में सदा उपस्थित रहकर प्रभु की पूजा (अभि+अर्चना) कोई क्षणसाध्य हंसी खेल नहीं। प्रथम तो आसुरी भावनाओं से अभिभूत लोग सर्वभूतहित में प्रवृत नहीं होते। (कहते हैं-मुझे क्या, मैंने कोई संसार की भलाई का ठेका लिया है।) कोई मननशील व्यक्ति ही इस ओर झुकते हैं। फिर वे भी मनन तक ही रह जाते हैं, यत्न कुछ नहीं करते।
मनुष्याणां सहस्त्रेषु कश्चिद् यतति सिद्धये। यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्वतः॥ (गीता 7/3) मननशीलों में से भी सहस्त्रों में कोई एक सिद्धि के लिए यत्न करता है और यत्न करनेवाले सिद्धों में भी कोई ही पूर्णतया तत्व ज्ञान पाता है। यत्न किस प्रकार का ?
अभ्यासेन तु कौन्तेय वेराग्येण च गृह्यते॥ (गीता 6/34) स्वकर्म विपरीत आचरणों से निरन्तर विरक्ति तथा अनुकूल आचरणों का निरन्तर अभ्यास करने से सिद्धि मिलती है। अभ्यास भी एक आध दिन नहीं, तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्, जो निरन्तर रात-दिन अभ्यास में जुटे रहते हैं, उनके योगक्षेम की चिंता मैं करता हूं। फिर सिद्धि भी तत्क्षण नहीं होती। तत् स्वयं योगसंसिद्धह्न कालेनात्मनि विन्दति॥ (गीता 4/38) सच्चे ज्ञान को योगसाधन करने वाला समय पाकर अपने अन्दर ही पा लेता है। यह समय कितना?
अनेककजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्।(गीता 6/45) जन्म-जन्मान्तर तक साधन करता हुआ पुरुष सिद्ध होकर परमगति को प्राप्त होता है। यह है परम कल्याणकारी भक्ति।
इसके विपरीत अजामिलोपाख्यान को देखिये, वहां किसकी जन्म-जन्मांतर की साधना? वहां तो पुत्र का नाम नारायण रख दिया। बस हो गया कल्याण। कोई सन्देह न रहे, इसलिए स्पष्ट शब्दों में घोषणा की गई है- सांकेत्यं परिहास्यं वा स्तोभं जल्पनमेव वा। मुरारिनामग्रहणं निह्नशेसाघहरं विदुह्न॥ संकेत में, उपहास में, तान पलटों में, प्रमत्त प्रलाप में, किसी प्रकार भी मुरारी का नाम मुख से निकल जाये बस, वह सबके सब पापों का नाश करने वाला है।
कहां वह कर्ममयी भक्ति! कहां यह कर्मनाशा भक्ति!
श्रीकृष्ण सच्चे कर्मयोगी और प्रभुभक्त थे। महाभारत में जहां भी उचित अवसर आया, वे सन्ध्योपासना में लीन हो गए, कहीं नहीं चूके। एक दृष्टांत पर्याप्त होगा। कृष्ण शांतिदूत बनकर कौरव सभा में जा रहे थे कि संध्या का समय होते ही-
अवतीर्य रथात्तूर्णं कृत्या शौचं यथाविधि।
रथमोचनमादिश्य सन्ध्यामुपविवेश ह॥ (महा. 5/82/21)
रथ से उतरकर, सानादि से शुद्ध होकर, घोड़े खोलने का आदेश देकर कृष्ण संध्या में बैठ गये। उन्हे किसी फल में आसक्ति नहीं थी। क्षत्रियोचित कार्य का चुनाव उन्होंने स्वयं किया। मिथ्याभिमानी उन्हें ग्वाला कहकर घृणा करते रहे। परन्तु भीष्म सरीखे विद्वान् ने राजसूय में अर्घ्यदान का अधिकारी श्रीकृष्ण को ही समझा।
यहां एक शब्द मिथ्याकुलाभिमान का प्रयोग किया गया है। यहां इस पर थोड़ा विचार कर लेना अप्रासंगिक न होगा। कुलाभिमान स्वयं कुछ बुरी वस्तु नहीं। परन्तु मनुष्य को अभिमान करना तो आना चाहिए। अभिमान जब भूतकाल का रूप धारण करता है तो सर्वनाश का कारण होता है, जब वह भविष्यकाल अथवा लक्ष्य प्राप्ति का रूप धारण करता है तो वह परम हितकारक होता है। जैसे-अहं ब्राह्मणानां कुले जातः तस्माद् ब्राह्मणो भविष्यामि। मया तपसा ब्रह्मचर्येण स्वाध्यायेन त्यागबलेन च ब्राह्मणत्वमुपार्जितव्यम्।
मैं ब्राह्मण के कुल में जन्मा हूं- इसलिए ब्राह्मण बनूगां। मुझे तप से, ब्रह्मचर्य से, स्वाध्याय से और त्याग के बल से ब्राह्मणत्व उपार्जन करना है। इनमें प्रथम अभिमान निरर्थक और दूसरा अभिमान कल्याणकारक है।
श्रीकृष्ण क्षत्रिय कुल में जन्मे थे, परन्तु उन्होंनें राजाधिराज दुर्योधन का भोजन स्वीकार न करके उस युग में शूद्र कहलाने वाले विदुर के घर भोजन ग्रहण किया। उन्होंने स्वभावानुसार क्षत्रियत्व का मार्ग चुना। यह उनका वरण (चुनाव) था, स्व+कार्य था। यह थी 'स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य' की व्याख्या। इसी के बल पर वे सच्चे भक्त थे।
श्रीकृष्ण का जन्म जेलखाने में हुआ, परन्तु कभी नहीं रोये कि मुझे बचपन में सुख नहीं मिले। शिक्षा अज्ञातवास में नन्दगोप के घर हुई, परन्तु आग छिपेगी कहां ?
कंस भारत में गोहत्या का आदि प्रवर्तक था। ससुराल में नरबलि होती थी। जरासन्ध ने 100 राजाओं का सिर काटकर शिवजी पर बलि चढ़ाने का व्रत लिया था। 86 राजा इकट्ठे भी कर लिये थे, परन्तु किसे पता था कि क्षत्रियशिरोमणि कृष्ण जरासन्ध को मारकर उनका उद्धार करेंगे।
बाल्यकाल में कंस की लीला देखी ।
तस्मात् सर्वात्मना राजन् ब्राह्मणान् सत्यवादिनः।
तपस्विनी यज्ञशीलान् गाश्च हन्मो हविर्दुघाः॥
कंस के मन्त्री कहते हैं कि राजन्! देव यज्ञों के सहारे जीते हैं और यज्ञ गौ-ब्राह्मण के सहारे। इसलिए आओ सब उपायों से सत्यवादी ब्राह्मण और गाय इन दोनों को न मारें।
इस गोहत्या का सबसे अधिक प्रभाव निश्चित रूप से गोपालों पर पड़ा। इनमें एक गोपाल रायाण नाम का बड़ा बुद्धिमान था। उसने विद्रोह का बीज बोया। राधा नाम की एक गुप्त मण्डली बनी, जो प्रत्यक्ष में तो नाच-गाकर प्रभु आराधना करती थी, परन्तु वास्तव में कंस के विरुद्ध विद्रोह की तैयारी करती थी। बालक कृष्ण भी इस मण्डली में आते-जाते थे, क्योंकि यह रायाण कृष्ण का मामा होता था, माता यशोदा का रिश्ते में भाई था। यद्यपि कृष्ण की आयु छोटी थी, परन्तु इनकी विलक्षण प्रतिभा देखकर रायाण मरते समय इस मण्डली का नेतृत्व कृष्ण को सौंप गया।
इस मण्डली का कीर्तन सारे कंस राज्य में फैला, कंस के प्रति विद्रोही सब नर-नारी इस मण्डली में सम्मिलित हुए। सब नरों का एक वेष, सब नारियों का एक वेष। नियत तिथि पर सब वृन्दावन की रेती पर इकट्ठे हुए। सैनिक नियमानुसार डंका बजते ही जो जिस अवस्था में होता था, सब काम छोड़कर अपने स्थान पर पहुंच जाता था।
कंस को कुछ सन्देह हुआ, उसने अक्रूर को पता लगाने भेजा भी, वरन्तु वहां तो सारा राष्ट्र विद्रोह के लिए तैयार बैठा था।
रास हुआ, रास किसे कहते हैं? 'रास' शब्द रस से बना है । सो पहले रस क्या है यह समझ लें। यह 'रास' शब्द 'रस शब्दे' इस भ्वादिगण की धातु से बना है। जब कोई मनोवेग इतना प्रबल हो उठे कि वह चुप न रह सके, वह चिल्ला उठे तब वह रस हो जाता है, जो उस रसवालों का सम्मिलित गान है वह रास कहलाता है।
यह रस कौन-सा था ?
ऊपर तो श्रृंगारमय भक्ति रस था। नहीं तो कंस सोया कैसे रहता ? परन्तु वास्तव में वीर रस था। सब एक रंग में रंगे थे। कंस कुश्तियों का शौकीन था। हर वर्ष उसके अखाड़े में कुश्तियां होती थी। हर एक कोने में नाकेबन्दी थी। वृन्दावन में विशाल स्वयंसेवक सेना (राधा) तैयार खड़ी थी, परन्तु वाह रे संगठन! जब तक अखाड़े में छलांग मारकर कृष्ण कंस की छाती पर सवार नहीं हो गये, किसी को हवा तक नहीं लगी।
कंस का सिर काट लिया गया, परन्तु किसी ने अंगुली तक नहीं हिलाई। कंस मारा गया। सारी प्रजा हाथ जोड़े खड़ी थी।
''आपने कंस के अत्याचारों से हमारी रक्षा की, अब राज्य भी आप ही सम्भालिये।''
कृष्ण बोले ''राज्य तो नाना जी सम्भालेंगे।''
''और आप ?''
''हम खोया हुआ राज्य लेने जा रहे हैं।''
वेदज्ञ ऋषियों ने मर्यादा बनाई कि चाहे चक्रवर्ती राजा का बेटा ही क्यों न हो, घर के वैभव और विलास के वायुमण्डल में नहीं पलेगा। उसे वशिष्ठ की कुटिया में रहना होगा,जल भरना होगा,समिधाएं लानी होगी, गायें चरानी पड़ेंगी। कठोर तप करके राजा बनने की योग्यता सम्पादन करनी होगी। अयोग्य होगा तो न केवल राज्याधिकार से वंचित होगा, अपितु निर्वासन का दण्ड पायेगा।
राम और भरत इसी शिक्षा पद्धति में पले और बढ़े थे। इसलिये दोनों ने राजमुकुट को ठोकर मारी। किस गर्व से वशिष्ठ मुनि बोले-
आहूतस्याभिषेकाय विसृष्टस्य वनाय च।
न मया लक्षितस्तस्य स्वल्पोप्याकारविभ्रमः॥
मैंने अपने शिष्य राम का चेहरा राजगद्दी के लिए निमन्त्रण के समय भी देखा। वनवास का आदेश मिलने पर भी देखा, परन्तु दोनों समय विकार की एक रेखा भी माथे पर नहीं देखी। ऐश्वर्य बढ़ा, भोग-विलास बढ़ा, मर्यादा टूटी। क्षत्रियों ने गुरुकुल में जाना बन्द कर दिया। परिणाम ?
जुआरी धर्मराज कहलाए और राजगद्दी के लिए दुर्योधन ने कह दिया- 'सूच्यग्रं नैव दास्यामि, विना युद्धेन केशव।' बिना युद्ध के हे कृष्ण! सूई की नोंक बराबर भी भूमि नहीं दूंगा। हवा नहीं बदली, पानी नहीं बदला, गंगा नहीं बदली, हिमालय नहीं बदला, परन्तु ऐश्वर्य की बाढ़ से गुरुकुलवास की मर्यादा टूटकर बह गई। परन्तु एक ग्वालबाल मर्यादा पर अटल था। वह विद्या के सच्च्े राज्य की खोज में निकल पड़ा। मथुरा का राज्यमुकुट प्रतीक्षा ही करता रह गया। कृष्ण ने मथुरा छोड़ी और वेद साम्राज्य की खोज में उज्जयिनी पहुंचकर आचार्य सांदीपनि की कुटिया में विश्राम लिया। क्षत्रिय को सच्च गुरु मिल गया। यहां बैठकर कृष्ण ने कहा कि वेदव्यास जी तो चिल्ला रहे हैं-
ऊर्ध्वबाहुर्विरौम्येष न च कश्चिचछृणोति माम्।
धर्मादर्थश्च कामश्च स धर्मः, किन्न सेव्यते॥
''मैं दोनों भुजा उठाकर चिल्लाकर कहता हूं कि धर्म से ही अर्थ और धर्म से ही काम प्राप्त होता है, परन्तु मेरी सुनता कोई नही!''
कृष्ण ने निश्चय किया, मैं सुनूंगा और सुनाऊंगा। उन्होंने क्षत्रियों का मार्ग चुना, सोचा महाभारत राज्य तो आज खण्ड-खण्ड हो चुका है। महाभारत तो एक ओर रहा, आज तो भारत भी नहीं रहा, भारत भी सैकड़ों छोटे-छोटे राज्यों में बंट गया है । मै खण्डित भारत को भारत और भारत को महाभारत फिर बनाकर रहूंगा। धरती पर धर्म का एकछत्र राज्य होगा। राजा धार्मिक होगा तो सारे विश्व की प्रजा भी धर्मात्मा होगी- 'यथा राजा तथा प्रजा' । उस महापुरुष ने आचार्य सांदीपनि की कुटिया में जहां विद्या का राज्य प्राप्त किया, वहां साथ ही साथ चरित्र का राज्य भी प्राप्त किया।
ब्रह्मचर्य की समाप्ति पर वीरोचित मार्ग से रुक्मिणी का उद्धार करके गृहस्थ आश्रम में प्रवेश किया । उत्तम सन्तान की अभिलाषा थी। पति-पत्नी दोनों ने प्रथम रात्रि को वासक शरया पर बैठकर ब्रह्मचर्य व्रत धारण किया। प्रातह्नकाल ही उठकर हिमालय की ओर चल पड़े। जिस स्थान पर आज बद्रीनाथ धाम है, वहां 12 वर्ष तक घोर ब्रह्मचर्य व्रत का पालन किया । 12 वर्ष केवल बेर खाकर जीवन बिताया । इसलिए कृष्ण बद्रीनाथ और वह स्थान बद्रीनाथ धाम कहलाया।
प्रद्युम्न जैसा पुत्र पाया, जिसने उनकी अनुपस्थिति में द्वारिका की रक्षा की। धुन एक थी- महाभारत राज्य की स्थापना करने की । स्वयं राज्य करना नहीं चाहते थे। भारत के राजवंश की ओर दृष्टि पड़ी। घोर अंधकार। फिर भी राजनीतिज्ञ जो-जो सामग्री मिले उसी से काम चलाता है। एक ओर भोगी-विलासी, ईर्ष्यालु, अन्यायी, जुआरी दुर्योधन था। दूसरी ओर सत्यवादी, न्यायप्रेमी, ईर्ष्यारहित तथा चित्रसेन गन्धर्व की कैद से दुर्योधन को छुड़ाने वाला जुआरी युधिष्ठिर था। अन्धों में काना राजा, जुआरी तो दोनों थे, परन्तु युधिष्ठिर में केवल एक यही दोष था। वेदज्ञ कृष्ण इसके घोर विरोधी थे। महाभारत के वनपर्व के 13 वें अध्याय में स्पष्ट कहा है कि युधिष्ठिर, जब तुम लोग जुआ खेल रहे थे, मैं एक युद्ध पर गया हुआ था, नहीं तो बिना बुलाये पहुंचकर धृतराष्ट्र को समझाता। यदि वह न मानता तो 'निगृह्णीयां बलेन तम्' उससे बलपूर्वक अपनी बात मनवाता, उसके सलाहकारों को प्राणदण्ड देता। पर वह समय तो हाथ से निकल गया।
राजसूय के समय धरती पर जिस एकछत्र साम्राज्य की स्थापना हुई थी, उसके सम्बन्ध में शिशुपाल जैसे अभिमानी को भी कहना पड़ा था-
हम इस महात्मा युधिष्ठिर को कर देते हैं सो न तो भय से, न लोभ से, न खुशामद से। पृथिवी पर एकछत्र राजा बनने के लिए इसने अपनी प्रजा का पालन अति तत्परता से किया। इसे धार्मिक प्रवृत्ति में सर्वश्रेष्ठ समझकर हम सब इसे स्वेच्छा से कर देते हैं और अपना राजा मानते हैं। (महाभारत 2.34.12.13)
परन्तु युधिष्ठिर की यह धर्मप्रवृत्ति जुये रूप अधर्म में प्रवृत्ति से ऐसी नष्ट हुई कि बना बनाया महाभारत राज्य एक दिन में नष्ट हो गया।
परन्तु श्रीकृष्ण तो किसी ऐहिक कामना से नहीं, केवल सर्वभूतहित कामना से प्ररित थे। इसलिए युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में अपने जीवन के लक्ष्य की पूर्ति को चरम सीमा पर पहुंचते देखकर भी उन्हें मद छू तक नहीं गया। उल्टा युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में उन्होंनें ब्राह्मणों के चरण धुलाने का काम स्वयं अपने हाथों में लिया।
आज हमारे देश में लाखों नर-नारी ''कृष्ण-कृष्ण, राधे-कृष्ण'' आदि शब्दों से कृष्ण को याद करते हैं। कृष्ण अपने जीवनकाल में पूजे गये। युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में उन्हें अर्घ्यदान मिला और युधिष्ठिर की ओर से दुर्योधन के पास जब वे शांति सन्देश लेकर गये थे, तब भी सारे रास्ते भर उनका स्वागत हुआ । परन्तु इस थोथी भक्ति से कुछ लाभ नहीं। कृष्ण स्वयं बताते हैं कि यदि तुम मेरे भक्त बनना चाहते हो तो क्या करो? वे कहते हैं कि- 'मद्भक्त एतद् विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते।' यदि तुम मेरे भक्त बनना चाहते हो तो मेरे सदृश बन जाओ। जैसा मैं अपने चुने हुए क्षात्रधर्म के मार्ग से अपने प्रभु की निष्काम भाव से अर्चना करता हूं, ऐसे ही तुम भी अपना-अपना मार्ग चुनकर चातुर्वर्ण्य के द्वारा पूर्ण कर्मयोगी बनकर प्रभु की स्वकर्मणा अभ्यर्चना करो। यह जीवन शयनक्षेत्र नहीं है, कुरुक्षेत्र है, इसलिए कर्म करो। गीता की अनासक्त कर्मयोगमय भक्ति को झोंपड़ी-झोंपड़ी तक पहुंचाओ। लेखक- स्वामी समर्पणानन्द सरस्वती
जीवन जीने की सही कला जानने एवं वैचारिक क्रान्ति और आध्यात्मिक उत्थान के लिए
वेद मर्मज्ञ आचार्य डॉ. संजय देव के ओजस्वी प्रवचन सुनकर लाभान्वित हों।
धर्म की अनिवार्यता एवं सुख
Ved Katha Pravachan - 18 (Explanation of Vedas) वेद कथा - प्रवचन एवं व्याख्यान Ved Gyan Katha Divya Pravachan & Vedas explained (Introduction to the Vedas, Explanation of Vedas & Vaidik Mantras in Hindi) by Acharya Dr. Sanjay Dev
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